Sunday, 4 November 2018

अब प्यार दोबारा ना होगा

टूट कर बिखर गया था मैं,
आज फिर अपना अस्तित्व मैने पाया हैं।

मत पूँछ बेवफा खुद को वापस पाने के लिये,
कितना खुद को तडपाया हैं।

कितने सपनो की मजारों को दिल मे दफन कर,
दिल मे ही एक कब्रिस्तान बनाया हैं।

कितना रोया हूँ मैं,
ना जाने कितने अपनो को खोया हूं मैं।

आज मैने खुद को पा तो लिया हैं,
पर सबसे जहाँ मे सबसे ज्यादा अपने आप को अकेला कर लिया हैं।

अब इस जहाँ से, इसके बनाये समाज से,
उस समाज के रिश्तो से, कुछ बेबुनियादी नियमो से,
खुद को आजाद कर लिया हैं।
अब एक वादा मैने खुद से भी कर लिया हैं।

जिन्दगी मे अब कभी किसी शक्स पर अब ऐतबार ना होगा,
चाहे बीत जाये यह जीवन तन्हा ही राहों मे इस तन्हाराही को अब कभी किसी से प्यार ना होगा।

आयुष पंचोली
ayush_tanharaahi

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Saturday, 3 November 2018

कुछ ऐसे ही

तुझे कुछ बुरा बोलू भी तो बोलूं कैसे,
तेरी तोहिन तेरी नही,
मेरी ही मोहब्बत की तोहिन होगी।

आयुष पंचोली
©ayush_tanharaahi

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कुछ ऐसे ही

जिस तरह मिलते हैं, धरती और अम्बर दूर कहीं क्षितिज पर,
क्या हम भी कभी मिल पायेंगे कभी ,किसी दिन ,कही ,किसी रोज...?
*
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अक्सर यह ख्याल दिल मे मेरे आता हैं,
तुझे सोचता हूँ तो पुरानी यादों से रिश्ता फिर जुड़ जाता हैं।

क्या खुशी, क्या गम, क्या मोहब्बत और क्या सितम,
तेरा हर एक वादा रह-रह कर बार-बार याद आता हैं।

तु तेरी दुनिया की रंगत मे मशरूफ कैसी हैं,
मेरा हर पल यहाँ सिर्फ तेरी राह तकता हैं।

क्या एहसास नही तुझे थोडा भी मेरे दर्द-ए-तन्हाई का,
मेरे अश्को मे भी नजर आता हैं दर्द तुझसे जुदाई का।

मैं लिखता हूँ तुझे, अपने एहसासो की शिद्दत से,
किसी को क्या पता दिल रोज मेरा कितना रोता हैं।

शब्द पन्नो पर बिखरते हैं, लहू आँखो से छलकता हैं,
कोई जाने गा क्या-क्या मेरे साथ घटता हैं।

तुझे भूलूँ भला कैसे कोई तरकीब बतला दे,
नही तो मुझको मेरी धड़कनो से राहत दिलवा दे।

नही अब और हिम्मत हैं की खुद को रोज मरता देखूँ मैं,
इससे तो भला हैं तु मुझे इक रोज दफना दे।

मोहब्बत से मैं अब नफरत बड़ी शिद्दत से निभाऊँगा,
जिन्दगी को मोहब्बत मे तबाह अब मैं कर जाऊँगा।

मेरी हर एक कहानी पर अब सारी दुनिया रोयेगी,
जा बेवफा तुझे भी मोहब्बत अब नसीब ना होयेगी।

मेरे जज्बातों को तुने पागलपन का नाम दिया था ना,
इन्ही जज्बातो की शिद्दत को ,पाने को तु हर शाम रोयेगी।

मेरे हर दर्द का एहसास एक ना एक दिन तुझे भी होना हैं,
मेरा तो खो गया सबकुछ, तुझे जबसे हूँ खो बैठा ।

मेरा जो हाल अब हैं ना,
वो तेरा हाल ,कल होना हैं ।

कर्मों से भला अपने कहाँ कोई बच पाता हैं,
वो ईश्वर सबको अपनी असल औकात दिखाता हैं।

आज मेरा सब खोया हैं,कल तेरा भी जायेगा,
अभी वक्त पलटने दो मेरा आज तुम्हारा कल बन जायेगा।

आयुष पंचोली
ayush_tanharaahi

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Friday, 2 November 2018

दिवाली

क्युं ना इस दिवाली उम्मीद, प्रेम, भाईचारे, साहस और सम्मान के पाँच दिये जरा औरों के लिये भी लगाये,
क्युं ना कुछ ऐसा करे यह दिवाली जिनके परिवार नही हैं, उनके साथ ही मनाये।

कुछ खुशियाँ उन्हे भी दे,
कुछ उनसे दुआएं हम भी ले आये।

इन्तजार तकती हैं वो आँखे भी ,
कोई अपना आये जो हमारे साथ भी कभी त्योहार मनाये।

क्युं ना इस दिवाली अपनो की जगह,
अपनो की तलाश करने वालों के सपने पुरे किये जाये।

क्या पता जिन्दगी कब कौनसा मोड़ ले,
उनकी उम्मीदों के दामन को शायद हमारा ही प्रेम एक नया मोड़ दे।

भाईचारे की एक नई उड़ान भरी जाये,
कुछ साहस और सम्मान उन्हे भी दे दिया जायें।

क्युं ना यह दिवाली कुछ ऐसा किया जाये,
की हमारी वजह से ही कोई कुछ पल खुशी के जी जाये।

गर हो मुमकिन तो क्यों ना यह दिवाली,
किसी अनाथालय,किसी वृद्धाश्रम मे कुछ अपनो के त्यागें हुए,
अपनो का इन्तजार करती चंद गुम हो चुकी मुस्कुराहटो के साथ मनाई जाये।

क्युं ना इस दिवाली उम्मीद, प्रेम, भाईचारे, साहस और सम्मान के पाँच दिये जरा औरों के लिये भी लगाये,
क्युं ना कुछ ऐसा करे यह दिवाली जिनके परिवार नही हैं, उनके साथ ही मनाये।

आयुष पंचोली
©ayush_tanharaahi

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कुछ ऐसे ही

हम नही वो दीपक जो हवा के एक झोंके से ही अपनी पहचान खो दे,
हम वो आग हैं, जो हवा के वेग से मिलकर तबाही का मन्जर ले आती हैं,
जब अपनी पर आती हैं, तो सारा जंगल निगल जाती हैं।

क्या रोकोगे तुम अपने खोखले षडयंत्रो से हमे,
हमे तूफानो से लड़ने का हुनर आता हैं।

बीच भंवर से भी निकाल लाएंगे हम कश्तियाँ,
हमे सहराओ से निकल आने का फन आता हैं।

हम ठगा जाते हैं बस अपनो के ही हाथों,
हमे रिश्तों मे चाले चलने का शौक नही हैं।

वरना जमाना जानता हैं, बेखौफ़ , बेझिजक,
बन्दा मुश्किलों से टकराना जानता हैं।

आयुष पंचोली
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Thursday, 1 November 2018

पिता

चाहत नही हैं मेरी, पिता की कमाई दौलत से शौहरत पाऊँ मैं,
बस एक विनती है रब तुझसे,
मेरे पिता का आशीर्वाद और सर पर सदा उनका हाथ रहे,
फिर चाहे शौहरत पाऊँ ना पाऊँ मैं,
मेरी असली दौलत और उनका नाम हर पल मेरे साथ रहे।

आयुष पंचोली
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त्यौहार लोकतंत्र का

प्रजातांत्रिक लोकतन्त्र का आया त्यौहार सुनहरा हैं,
देश मे मेरे बढ गया रैलियों का अब जखेरा हैं।

जनता का करोड़ो रुपया फुकेंगे अपने प्रचारो पर,
निकल पडेंगे सारे खटमल जनता को मूर्ख बनाने पर।

कुछ महिनो मे करोड़ो लोग, अपने मत से चुनेंगे कुछ हज़ार लोगो को,
गढ़ने को नई किस्मत , देने को नई दिशा मेरे भारत की सूरत को।

जानते हैं, कुछ नही होना हैं,
हर बार की तरह इस बार भी हमारे मत का दुरुपयोग ही होना हैं।

हम कहाँ कभी एक हो पाये हैं,
जो देश को एक दिशा मे लेजा पायेंगे।

मत भी हमारे बटेंगे,
जात-पात, धर्म-मजहब, मन्दिर-मस्जिद के नाम पर।

इसी तरह से देश भी बंटता जायेगा,
मतों के आधार पर।

सोच हमारी सही नही हैं,
देश को कैसे सँवारेंगे।

जब तक हम खुद बंटे हैं,
कैसे भारत को एक साँचे मे ढालेंगे।

सोच मे भारतीयता ना हो तो मतदान किस काम का,
जात और धर्म के नाम पर ही चुनना हो अपना प्रतिनिधि तो प्रजातांत्रिक लोकतंत्र किस काम का।

कैसी अजीब विडम्बना देखो मेरा देश हैं झेल रहा,
ज्ञान और बलिदानो की भुमि होकर भी, अपने आस्तीन के सांपो का दंश हैं झेल रहा।

अब भी वक्त हैं, गर सुधर गए हम,
तो एक नया आगाज़ हो जायेगा।

सच मे अगर हर भारतवासी मे भारतीयता जाग उठती हैं अब तो,
नया हिन्दुस्तान खड़ा हो जायेगा।

आरक्षण, भुखमरी, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, नारी सम्मान के मुद्दो पर लड़ने वाले गर,
एक रास्ट्र, एक जात , एक ही नागरीकता की बात करे तो असल मायनो मे यह लोकतंत्र बन जायेगा।

फिर ना ही यह मुद्दे होंगे, ना ही कोई गुलाम,
असल मायनो मे देगा मेरा भारत उस दिन आजादी का पैगाम।

आयुष पंचोली
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कुछ ऐसे ही

खुद को खोकर पाई गई तारीफ का कोई मौल नही होता,
अपना जमीर बेंच कर पाई दौलत से कोई अमीर नही होता।

भले ही भोजन मे पकवान ना हो ,
इंसान मे आत्मसम्मान का होना जरुरी हैं।
कोई नही छिन सकता आपसे अस्तित्व आपका,
ऐसी हर गैरकानूनी हरकत का विरोध जरुरी हैं।

कब तक अत्याचार सहोगे,
कब तक यूँ लाचार रहोगे।
यूँ ही जीवन भर घुटते रहे तो,
जीवन के क्या हाल कहोगे।

आयुष पंचोली
©ayush_tanharaahi

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Wednesday, 31 October 2018

हमसे ना हो पायेगा

खुद को बेच दूँ,
मैं पाने को मोहब्बत तेरी।
माफ़ करना जाना,
हमसे नही हो पायेगा।

जलता रहे मुझसे जुड़ा कोई रिश्ता,
और मैं खामोश खड़ा रहूँ समाज के बनाये नियमों के आगे।
माफ़ करना मेरे समाज के ,
तथाकथित ठेकेदारों,
हमसे ना हो पायेगा।

धर्म को मेरे होता देखूँ अपमानित,
उसके ही तथाकथित रखवालो के हाथों
माफ़ करना मेरे धर्म के कथित रक्षको,
हमसे ना हो पायेगा।

सत्य को पराजित होता देखूँ,
झूठ का माल्यार्पण हो।
फिर भी खामोश खड़ा मैं देखूँ,
हमसे ना हो पायेगा।

मेरे कर्मो का दोष सहना पड़े,
मात-पिता को मेरे।
उनका सर शर्म से झुक जाये जमाने मे,
मैं मुस्कुराओ मयखाने मे।
ना जी ना हमसे ना हो पायेगा।

मैं बुरा हूँ, तो बुरा कहो मुझे,
क्युं झुठा यह सम्मान का दिखावा करते हो।
झुठा सम्मान पाना गंवारा नही मुझे,
सच्ची बुराई सुनना चाहता हूँ।
झुठ को शिरोधार्य कर नाचूँ मैं,
और सच से छुपता जाऊँ।
ना हमसे ना हो पायेगा।

अपने जमीर को गिरवी रख कर ,
करे सौदा पाने को वाहवाही।
माफ़ करना दोस्तो
हमसे ना हो पायेगा।

आयुष पंचोली
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Tuesday, 30 October 2018

कुछ ऐसे ही

अजीब सा गुमान पाल रखा हैं हमने दोस्तो,
की लेखक के सिर्फ़ शब्दोँ को ही पड़ा जाता हैं,
रचना से उसके भावो का मंथन किया जाता हैं।

जितनी जल्दी यह भ्रम टूट जायेगा ,
उतने ज्यादा भावो को यह दिल शब्दो का रूप दे पायेगा।

आज के दौर की असलियत कुछ और हैं,
आज लिखे से ज्यादा प्रचार और दिखावे का शौर हैं।

चापलूसी करने वालों का चहुँ और महिमामंडन होता हैं,
देखो यारो किस तरह आजकल ज्ञान का खंडन होता हैं।

आयुष पंचोली
ayush_tanharaahi

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Monday, 29 October 2018

बचपन

अमीरी ,गरीबी की सोच से परे यह बचपना हैं मेरा,
जो खेल अधरों पर मुस्कुराहट बिखेर दे वही असल खेल हैं मेरा।

मैं तो अन्जान हूँ ,दुनिया की रस्मो से,
अभी नादान हूँ , उल्टा सीधा मैं एक समान हूँ।

ना कोई बैर मन मे मेरे, ना किसी से कोई शिकवा हैं,
अभी मनुष्य हुआ नही हूँ मैं, अभी मैं इन्सान हूँ।

नही समझना दुनियादारी, नही चाहता कोई समझदारी,
मैं खुश हूँ अपनी मस्तियो मे, हो चाहे वो महलों मे या बस्तियों मे।

ना अमीरों के खेल पता हैं मुझे, ना गरीबों के,
ना मुझे मेरी पहचान का कोई भान हैं।

मैं बचपन जी रहा हूँ मेरा, मेरे अधरों पर छाई जो मुस्कान हैं,
बस यही जिन्दगी जीना चाहता हूँ मैं, जो समाज और दुनिया के बनाये उसुलो से पूरी तरह अन्जान हैं।

आयुष पंचोली
©ayush_tanharaahi

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सच्चे लोग

जरा जरा सी बात पर जिनकी आँखे भीग जाती हैं, वो लोग जीवन मे कभी किसी का बुरा चाह नही सकते। पर एक सच यह भी हैं, वो जीवन मे कभी किसी को अपना बना...