Thursday, 18 October 2018

कुछ ऐसे ही

कभी कभी लगता हैं , क्या हम सच मैं वही ज़िन्दगी जी रहे हैं जो हम हैं या हम जीना चाहते हैं। फिर धीरे से आवाज आती हैं नही। सही हैं ना हम क्या हैं ,ओर हम  क्या नही ये सिर्फ हम जानते हैं। हम सब जो हैं , जो जीना चाहते हैं , वो नही जी रहे । हमे पता हैं यह सत्य हैं, फिर भी हम सबको सिर्फ यह विश्वास दिलाने मे लगे रह्ते हैं की हम जो चाहते हैं, हम वही कर रहे हैं। क्या करें यार ....
"झूठी दुनिया , झूठे लोग ।
झूठे सपने , झूठी खोज।
झूठ आज मे, कल मे झूठ।
हर पल ,हर एक क्षण मे झूठ।
जो देखा वो झुठा देखा।
जो पाया वो झुठा पाया।
ज्ञान मिला टूटा फुटा सा।
सबके द्वारा छला हुआ सा।
फिर मान, सम्मान झूठ हैं।
मिले मुझे जो , इनसान झूठ हैं।
झुठा हुँ मैं, झूठे हो तुम।
झूठे सब रिश्ते नाते हैं। "
©ayushpancholi

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