Thursday, 18 October 2018

कुछ ऐसे ही

कभी कभी दिल करता हैं , वापस बचपन मे लौट जाऊँ। पर दिमाग जानता हैं यह सम्भव नही। दिल ओर दिमाग दोनो की बहस निरन्तर जारी हैं , हर जगह हर चीज मे। क्या करें एक ही घर मे दो घातक चीज हैं। खैर छोड़ो जाना तो है बचपन में, तो सोचा बच्चो को ही अपना दोस्त बना लो। बच्चे निस्छल , निश्कपट होते हैं। उनका प्रेम दिखावे का नही होता। वो सबको अपनाते हैं, कोई उंच-नीच नही, कोई जात पात नही। सोचो तो फिर क्यू नही मन करेगा यार बचपन मे जाने का। इसलिये मैने बचपन मे जाने के लिये बच्चो को ही अपना दोस्त बना लिया। उनके बचपने मे मुझे मेरा बचपन नज़र आता हैं । उनकी हंसी , उनकी खुशी देखकर मे एक अलग ही आनन्द अनुभव करता हूं। सच कहा हैं किसी ने ,बच्चे भगवान का रूप होते हैं। आपकी दिनभर की थकान , आपके विचार ,आपके उन्माद को एक प्यारी सी हंसी से ही दूर कर देते हैं। ये मेरा अनुभव हैं, मैं नही जानता कुछ भी , पर हाँ बचपन से बड़कर कुछ नही हैं यार यह तो मैं जानता हूं , ओर बस उसी बचपने को मैं उन बच्चो के साथ जीना चाहता हूं जो मुझे हर जगह मिलते हैं, कॉलोनी मे किसी दोस्त के बच्चे , कही घुमने जाये तो किसी मुसाफिर के बच्चे, आपसे किसी प्रकार की मदद मांगने आये बच्चे। बच्चे तो बच्चे हैं , ये वही जी रहे हैं जो आपने कभी जियाँ हैं, या आप वो जीना चाहते थे। तो उन्हे जीने दो वो पल ओर आप उनकी खुशी मे अपनी खुशी को मेहसूस करो। बहुत अच्छा लगता हैं जब हमारे सामने हमारा बचपन होता हैं।
©ayushpancholi

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